महिने का पोस्ट

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विगत कुछ वर्षों से एक नयी सोच और शैली के माध्यम से ब्राह्मण जागृति एवं विकास को निरन्तर तत्पर संगठन विप्र फाउंडेशन के प्रयास अब रंग लाने लगे हैं। कोलकाता, गुवाहाटी, दिल्ली, जयपुर और सूरत के पांच विप्र महाकुंभ आयोजनों ने सुषुप्त विप्र समाज में एक नयी ऊर्जा व क्रान्ति का सूत्रपात किया। किसी ने सोचा भी न था कि इस प्रकार योजनाबद्ध रूप से एक दूरगामी सोच लेकर विप्र समाज की संस्थाओं में कार्य किया जा भी सकता है। हैदराबाद, चेन्नई, बंगलुरु, मुंबई, पुणे, सूरत, अहमदाबाद, नागपुर, रायपुर, भुवनेश्वर, कटक, राउरकेला, शिलांग, दीमापुर, तिनसुकिया, सिलीगुड़ी, दुर्गापुर, पुरुलिया, टाटानगर, वाराणसी, वृन्दावन, तिरुपति, किशनगंज, मालदह, जोरहाट, भिवानी, गुड़गांव, महेंद्रगढ़, हरिद्वार, गाजियाबाद, वापी, अबोहर, फरीदाबाद, राजनन्दगांव, रांची, जम्मू, चंडीगढ़, इंदौर, कानपुर, नासिक, देवघर शायद ही भारत का कोई ऐसा शहर बचा होगा जहां विप्र फाउंडेशन ने दस्तक नहीं दी होगी। यहाँ तक की पड़ोसी देशों नेपाल, भूटान तक भी पँहुच कर वहाँ विप्र जयघोष का शंखनाद एक अपूर्व घटना थी। लगभग पांच हजार किलोमीटर सड़क मार्ग से रथयात्रा एक अभिनव प्रयोग रहा जिसके माध्यम से समाज की अंतिम पंक्ति में बैठे व्यक्ति तक पँहुच संगठन ने अपने दृढ़ इरादों को व्यक्त किया। प्राप्त जानकारी अनुसार देश के करीब 300 स्थानों पर 3500 से ज्यादा छोटे बड़े आयोजन अबतक विप्र फाउंडेशन कर चुका है। इस दौरान पूर्व के अनुभवों व परिणामों को दृष्टिगत रखते हुए कुछ लोग तो आश्वश्त ही बैठे थे कि जब तब झगड़े होंगे और फिर संस्था बिखर कर बन्द, वही ढाक के तीन पात वाला हाल होना ही है। लेकिन ऐसे नकारात्मक भाव वाले लोगों के मुंह पर करारा तमाचा और धत्ता बताते हुए संस्था मजबूती से कार्य ही नहीं कर रही बल्कि लगातार विस्तार हो रहा है। इन सात आठ बरसों की यात्रा में कई जुड़े तो कई टूटे, फिर जुड़े, लेकिन कारवाँ जारी रहा। विप्र फाउंडेशन ने अपना पूरा ध्यान शिक्षा, स्वावलम्बन, सकारात्मकता, सशक्तिकरण, संस्कार जैसे मुद्दों पर ही केंद्रित रखा। यही कारण रहा कि युवा वर्ग संस्था की ओर तेजी से आकर्षित हो साथ लग गया। संस्था की कुछ योजनाएं तो ऐसी आयी की जिनकी आज देश भर के सामाजिक परिदृश्य में चर्चा है। शिक्षा ऋण, सीखो और कमाओ, सारथी, विप्र चेम्बर ऑफ कॉमर्स, वी2वी एप्प, संस्कारोदय आदि प्रकल्पों ने लोगों की गहराई से छुआ व जोड़ा है। पिछले कुछ बरसों से विप्र फाउंडेशन प्रयासरत रहा कि श्री परशुराम जयंती पर समाज का ऐक्य स्वरुप दिखे। समाज के मौजीज लोगों का प्रयास, विप्र फाउंडेशन की ईमानदारी से समाज संगठन की कोशिशें, युवाओं में प्रबल सकारात्मक भावना, ब्राह्मण समाज की निरन्तर अनदेखी जैसे विषयों ने अंदर ही अंदर भारी ज्वार पैदा किया। परिणाम सामने है। इस वर्ष स्वतःस्फूर्त रूप से राजस्थान में 90 प्रतिशत स्थानों पर एक ही यानि सामूहिक श्री परशुराम शोभयात्राएँ निकली। इनमे जोश व होश देखने लायक रहा। औरों की तरह तोड़ फोड़ नहीं अपितु नाचते, गाते समरसता का संदेश लिये कोटा, नागौर, बीकानेर, जोधपुर, चूरू, हनुमानगढ़, चाकसू, आबू, अजमेर, उदयपुर, चित्तौड़, भीलवाड़ा आदि कम से कम पचीस स्थानों पर सामूहिक यात्राओं में उमड़ी भीड़ और उसका जोश बहुत कुछ संकेत कर गया। गत रविवार को विप्र फाउंडेशन के तत्वावधान में उदयपुर में निकली मेवाड़ की अबतक की सबसे प्रभावी शोभायात्रा में उमड़ा जनसैलाब इस बात का द्योतक है कि ब्राह्मण अब अपने अधिकारों की रक्षा के लिये उठ खड़ा हुआ है। निरन्तर उपेक्षा, जातिगत द्वेष, आरक्षण दंश से त्रस्त ब्राह्मणों की ऐसी हुँकार अपेक्षित ही थी। और हाँ, यह मात्र पानी के बुलबुले की तरह अथवा व्हाट्सएप पहलवानों की तरह नहीं बल्कि इसके पीछे एक बड़ी टीम और गहरी सोच धरातल पर काम करती दिख रही है। लगता है कि विप्र फाउंडेशन की मेहनत अब चोखा रंग लाने लगी है।

—- जगदीश पंचारिया