पृष्ठभूमि

  1. पृष्ठभूमि

    भारत का सांस्कृतिक इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि सृष्टि के उषा काल से लेकर आज तक ब्राह्मणों ने अपने अपूर्व चिंतन एवं तप से ज्ञान-विज्ञान अर्जित करके इस महादेश एवं समाज का शोभन श्रृंगार किया है । वह स्वयं के लिए नहीं राष्ट्र, संस्कृति एंव मानवता के लिए जीता आया है । ब्राह्मणों का मूल मंत्र ही रहा है “सर्वे भवन्तु सुखिन:” । समाज एवं राष्ट्र जब भी दिग्भ्रमित हुआ तो ब्रह्म-कर्तव्य से अनुप्राणित होकर विप्र मनिषियों ने सुपथ दिखाया । जब भी शासन वर्ग अपने प्रजा पालन धर्म से विमुख हुआ तो भगवान परशुराम बनकर उनका परिष्कार किया ।

    कालक्रम से समय बदला, परिस्थितियाँ बदली और संस्कृतियों के संघात में जीवन दृष्टि भी प्रभावित हुई । पश्चिमीकरण ही आधुनिकीकरण का पर्याय बन गया । परूषार्थ चतुष्टय में अर्थ और काम ही धर्म और मोक्ष को लीलते गये । स्व-देश एवं स्व-संस्कृति की गौरवमयी भावना के क्रमश: क्षीण होते जाने से क्षेत्रवाद, वर्गवाद, सम्प्रदायवाद, जाति-उपजाति एवं भाषावाद लोगों के दिल एंव दिमाग पर ऐसे छा गए कि पूर्वजों के उदात्त जीवन मूल्य गौण होते चले गये ।

    छीजत के इस दौर में ब्राह्मण समाज की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण एंव आवश्यक हो गई है । देश, समाज और व्यक्ति-व्यक्ति में तेजस्विता का संचार करने का प्राथमिक दायित्व परम्परा एवं नियति दोनों ही दृष्टियों से ब्राह्मणों के कंधों पर आता है । अत: राष्ट्र एवं मानवता को मुद्मंगलमय बनाने हेतु भूदेवों को पूर्ण सक्रिय होकर जगद्गुरू रूपी दायित्व का निर्वाह करना ही पड़ेगा । ऐसा तभी सम्भव है जब हममें अपनी परम्परा का ज्ञान, जातीय चेतना और आत्मविश्लेषण की त्रिवेणी प्रवाहित होती रहेगी ।

    इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कोलकाता के यशस्वी एवं प्रखर सामाजिक कार्यकर्ता श्री सुशील ओझा ने शुभ प्रस्ताव रखा कि समय की मांग को दृष्टिगत रखते हुए विशेष प्रज्ञावान समाज एक साथ, एक मंच पर बैठकर परिस्थितियों पर विचार करें तथा नेतृत्व करे । राजस्थान ब्राह्मण संघ के समर्पित कार्यकर्ताओं ने संकल्प लिया कि हां, हम ऐसा प्रयत्न अवश्य करेंगे । दैवीय कृपा से संकल्प फलीभूत हुआ ।

    राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता एवं स्वजातीय गतिशीलता में जो भी व्यवधान है, उनके समाधान एवं परिहार के लिए संघबद्ध, मुक्त एवं अकुण्ठ भाव से विचार करने के पवित्र उद्देश्य के साथ विप्र महाकुंभ का शंखनाद हुआ ।

    अपने गौरवशाली अतीत की भाव-भूमि व वर्तमान की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए मां भारती के श्रृंगार एवं सम्पूर्ण भारतीय समाज को तेजस्विता प्रदान करने के पावन उद्देश्य से कोलकाता महानगर में २५ से २७ दिसम्बर २००९ को प्रथम विप्र महाकुंभ का अभूतपूर्व एवं अविस्मरणीय कार्यक्रम सम्पन्न हुआ । सरस्वती के क्षेत्र से प्रेरित ब्राह्मणों ने माँ गंगा की तटीय बंग भूमि पर वैचारिक मंथन किया । भारतीय मनीषा एवं शाश्वत मूल्यों  के संवाहक विप्र समाज में परस्पर संवाद, समन्वय एवं सृजन की दिशा में यह कार्यक्रम अत्यन्त सफल रहा ।

    देश के समस्त दिशाओं से पधारे हजारों स्वजनों ने संतों विद्वानों के उद्गारों से नि:सृत ज्ञानगंगा में अवगाहन कर स्वयं को और अधिक परिष्कृत करते हुए समाज के सर्वांगीण  विकास हेतु कदम बढ़ाए । परम्पराओं के साथ युगानुकूल परिवर्तन का शंखनाद करते हुए, सम्पूर्ण विप्र समाज ने अपूर्व एकजुटता के साथ एक नए युग के उदय का उद्घोष किया । सकारात्मक सोच के साथ ब्राह्मण- एकत्व एवं समग्र विकास हेतु एक अन्र्तराष्ट्रीय संगठन बनाने की घोषणा की गई । अनेक वर्गों और उपवगों में बंटा ब्राह्मण समाज विराट रूप में, एक मंच से, एक मन से, समवेत स्वर में बोल उठा ‘भगवान परशुराम की जय ! ‘आवाज दो हम एक हैं ! ‘विप्र एकता अमर रहे !

    विप्र महाकुंभ से छलके अमृत बिंदुओं पर विस्तारित चर्चा हेतु वर्ष २०१० की ९ जनवरी को कोलकाता में, ११ अप्रेल 
    को मुम्बई में तथा १ मई को दिल्ली में, बैठकें आयोजित हुई । व्यापक विचार-विमर्श के उपरान्त प्रस्तावित संगठन की रूपरेखा एंव समिति के गठन का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया ।

    समय आ गया, वर्षों से संजोई चिर-प्रतिक्षित साध के पूरा होने का । श्री परशुराम जयंती की पूर्व संध्या के अवसर पर १५-०५-२०१५ की शुभ बेला में समाज और राष्ट्र को समर्पित ब्राह्मण समाज के वैश्विक संगठन ‘विप्र फाउण्डेशन’ के उद्भव की घोषणा की गई।

    आओ ! हम साथ-साथ चलें ! आओ ! हम एक साथ बोलें !

    आओ ! हम नए युग के साँचे में ढ़लें ! आओ ! हम साम्यभाव पा लें !

    धरती पर उतारें नूतन उजाले !

    जय हो ।

  1. ABOUT US

    The culture and heritage of India will vouch for the fact that from the inception of the world till today,Brahmanas, with their irreversible faith,incredible knowledge and inexorable meditation, have been instrumental in the ornamentation of our society and the world at large.They live not for themselves but for the mankind. Their sole motto in life is ‘Sarve Bhavantu Sukhina ‘ i e  ‘May happiness dwell  everywhere’ Whenever the nation or the citizens go haywire , the Brahamanas ,being inspired by their sense of duty, have taken upon themselves the responsibility of projecting the right path to them.When the dominant rulers have tried to suppress their subjects,they, in the form of Lord Parashurama have successfully superceeded them.

    The culture, circumstances and  thought processes of  individuals have largely been influenced and changed with changing times.Now westernization has become synonymous to modernization.Money,  self indulgence and centralization have dominated  over values, morals ,ethics and religion.The decline in Patriotism and respect for ones culture have paved way for division in class, community,region ,religiion and differences based on linguistics.These differences have finally resulted in diminishing our ancestral values. 

    In this era of diminution,the role played by the brahmanas is of great significance in regaining the vibrance and vitality in the society and amongst the individuals.Contemplating culturally or as destiny may have it,they have always shouldered the responsibility in moulding the nation.Hence it becomes quite mandatory for this section of our society to actively carry on this herculean responsibility and attain success .This can be possible only if there is an inflow and realisation of our culture and conscience reflecting our heritage.

    keeping the aforesaid aim in mind,Mr Sushil Ojha ,a reputed philanthropist, put forward his suggestions that the entire society should walk hand in hand, discuss the conditions and circumstances and head towards attaining the betterment of the world.. The dedicated members of Rajasthan Brahman Sangh have vowed for the same and with the blessings of the Almighty are successfully treading in the desired direction.

    Vipra Mahakumbh has heralded the objectives of National Integrity, Social Harmony and Community Development. Reiterating our dignified past and accepting the present challanges faced by our motherland, the Vipra Mahakumbh commenced its memorable programme on the 25th of December 2009 in Kolkata aiming at presenting our society with the objectives thus mentioned and concluded .  the first Mahakumbh with great success on the 27th of December 2009. Inspired by the blessings of Goddess Saraswati (the Goddess of knowledge) on the pious banks of River Ganga in Bengal the Brahman Samaj Indulged into an elaborate discussion and began its journey in the direction of development of Indian Culture and Heritage .The Mahakumbh proved a great success in the process of the creation of such a society.

    Intellegentsia from all over the country graced the occasion and became the proud beneficiaries of the knowledge thus dispersed and eagerly stepped forword towards the development of our society.Thereaftert the Vipra Samaj with its benevolent workers announced the beginning of a new era. Keeping up their optimistic mindset clubbed with Brahman unity a new international organisation was hereby announced.The Brahman Samaj which has been traditionally divided into various groups and subgroups shouted in unison “Bhagwan Parshuram Ki Jai ” “vipra ekta amar rahe ” “Awaz do hum ek hai”.

    In order to discuss the achievements of the Vipra Mahakumbh, meetings were organised on 9th January 2010 in Kolkata,on 11th April in Mumbai and 1st May in Delhi the same year.
    On the auspicious eve of Sri Parshuram Jayanti on 15th may 2010 the foundation of an international organisation “VIPRA FOUNDATION ” was finally laid

    So let us all vow for a new positive change and brighten our Earth with vigour and vitality all around us.