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विप्र फाउण्डेशन

राष्ट्र एवं समाज को समर्पित ब्राह्मण समाज का वैश्विक संगठन

राष्ट्रीय एकता

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सब साधन से रहे समुन्नत, भगवन देश हमारा । देव प्रज्ञा से पूरित विप्र समाज ने अपने दिगंत भेदी तप व चिंतन से हमारे दिव्य राश्ट्र |

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सामाजिक समरसता

सामाजिक समरसता

जातीय संकीर्णता का ब्राह्मण समाज में कभी भी कोई स्थान नहीं रहा है । हम सर्वदा ही विशाल उदारता के पक्षधर रहे हैं ।

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स्वजातीय गतिशीलता

स्वजातीय गतिशीलता

अपनी परम्परा का ज्ञान, जातीय चेतना और आत्मविश्लेशण की त्रिवेणी समाज में प्रवाहित होती रहती है तभी समाज साक्षात् तीर्थराज की

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केंद्रीय समाचार

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पश्चिम बंगाल की शहरी विकास मंत्री से विप्र फाउंडेशन प्रतिनिधिमंडल की सौजन्य भेंट

पश्चिम बंगाल सरकार की शहरी विकास एवं नगरपालिका मंत्री श्रीमती अग्निमित्रा पाल से विप्र फाउंडेशन के प्रतिनिधिमंडल ने…

श्री परशुराम ज्ञानपीठ: शिक्षा, कौशल और संस्कार से सशक्त युवा पीढ़ी

शिक्षा, कौशल और संस्कारों से युवाओं के उज्ज्वल भविष्य की ओर एक सशक्त कदम। श्री परशुराम ज्ञानपीठ — जहाँ विद्यार्थियों को…

जोनल समाचार

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गुवाहाटी में भव्य नंदोत्सव कार्यक्रम हर्षोल्लास के साथ संपन्न

नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की! विप्र फाउंडेशन जोन -8-असम की इकाई गुवाहाटी चैप्टर महिला प्रकोष्ठ द्वारा अध्यक्षा…

विप्र फाउण्डेशन - पृष्ठभूमि

भारत का सांस्कृतिक इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि सृष्टि के उषा काल से लेकर आज तक ब्राह्मणों ने अपने अपूर्व चिंतन एवं तप से ज्ञान-विज्ञान अर्जित करके इस महादेश एवं समाज का शोभन श्रृंगार किया है । वह स्वयं के लिए नहीं राष्ट्र, संस्कृति एंव मानवता के लिए जीता आया है । ब्राह्मणों का मूल मंत्र ही रहा है “सर्वे भवन्तु सुखिन:” । समाज एवं राष्ट्र जब भी दिग्भ्रमित हुआ तो ब्रह्म-कर्तव्य से अनुप्राणित होकर विप्र मनिषियों ने सुपथ दिखाया । जब भी शासन वर्ग अपने प्रजा पालन धर्म से विमुख हुआ तो भगवान परशुराम बनकर उनका परिष्कार किया ।

कालक्रम से समय बदला, परिस्थितियाँ बदली और संस्कृतियों के संघात में जीवन दृष्टि भी प्रभावित हुई । पश्चिमीकरण ही आधुनिकीकरण का पर्याय बन गया । परूषार्थ चतुष्टय में अर्थ और काम ही धर्म और मोक्ष को लीलते गये । स्व-देश एवं स्व-संस्कृति की गौरवमयी भावना के क्रमश: क्षीण होते जाने से क्षेत्रवाद, वर्गवाद, सम्प्रदायवाद, जाति-उपजाति एवं भाषावाद लोगों के दिल एंव दिमाग पर ऐसे छा गए कि पूर्वजों के उदात्त जीवन मूल्य गौण होते चले गये ।

छीजत के इस दौर में ब्राह्मण समाज की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण एंव आवश्यक हो गई है । देश, समाज और व्यक्ति-व्यक्ति में तेजस्विता का संचार करने का प्राथमिक दायित्व परम्परा एवं नियति दोनों ही दृष्टियों से ब्राह्मणों के कंधों पर आता है ।

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